मेरी और मेरे बाबा की बनती नही
सुनी सी ये कहानी हैं
जानता हूँ ये सिर्फ़ मेरी नही
एक बाप-बेटे का रिश्ता यूँ ही बदनाम नही
पर इतनी tragedy इस relationship मैं पहले से थी नही
लगभग पाँच साल की उम्र तक बाबा की बाज़ू पर सोता था
देर रात तक रुकता उनके लिए, नींद भी तब तक आती थी नहीं
Fast forward to जब उम्र सोलह की हुई
बाघी बनने की ज़रूरत सी हुई
ना सोच मिलती थी उनसे, ना ज़िंदगी का सच
प्यार नहीं था, पर नफ़रत भी थी नहीं
रोटी, कपड़ा, इल्म, नाम, किसीकि भी ना थी कमी
बस एक ग़म सताता था मुझको, की प्यार जताना उनको आता था नहीं
शायद ना उन्होने कभी सीखा था, और ना किसी से वो सिख पाए थे
यतीम हो गये थे छूटीसी उम्र में बाबा, कसूर शायद उनका भी नहीं
कुछ महीने पहले, एक infection के रहते minor सी surgery हुई थी मेरी
दिन में माँ, और रात में देते थे बाबा अस्पताल में पहरेदारी मेरी
एक रात डेढ़-दो बजे, कांपता बुखार चढ़ा था मुझको, फटा था पिछवाड़ा मेरा
मेरे 65 साल के, कद-काठी से छोटे बाबा, पर भारी ना पड़ा था 130 का वजन मेरा
किसी तरह से उन्होने संभाला मुझको, सील दिया फटा हौसला मेरा
उस रात पता चला, 32 में भी, बाबा पर कितना dependent था अस्तित्वा मेरा
उनके लिए शायद प्यार का मतलब ही हैं पूरी करना ज़रूरत और ज़िमेदारी मेरी