जिस पदयात्रा पर ‘ग़रीब भारत’ निकल पड़ा है, वह सरकार से ज़्यादा, हमारे समाज के लिए सवाल है. क्या आपको महाराष्ट्र के किसानों के लहू-लुहान तलवे याद हैं? क्या आपको पिछले दो-एक साल में सीवर की सफ़ाई करते हुए मरने वाले लोगों की ख़बरें याद हैं? क्या आपको वो आदमी याद है जो साइकिल पर अपनी पत्नी की लाश ले जा रहा था?
बतौर समाज हम ऐसी बहुत सारी तस्वीरें देखते हैं, थोड़ी देर के लिए हमें बुरा-सा लगता है, हम भावुक होकर थोड़े चंदे-डोनेशन के लिए भी तैयार हो जाते हैं, लेकिन हमारी सामूहिक चेतना में महाराष्ट्र के किसान, सीवर साफ़ करने वाले या साइकिल पर लाश ढोने वाले ‘दूसरे’ लोग हैं, वो हममें से नहीं हैं, वे बराबर के नागरिक नहीं हैं.