तू उठ चला, लिए जिगर.
तो हो शुरू, बने लहर.
तू दे नया, किरण इन्हे.
तो सृष्टि का, रुके कहर.
तू त्याग कर….
भूल चूक ? या कपट ?
ये सोच मत, तू रह सजग.
तू रह अटल, इस मोड़ पर.
न लौट आ, रण छोड़ कर.
तू त्याग कर….
ये सोच मत, तू एक है.
इस राह पे, कई और है.
तू बात ये, बस जान ले.
को-रो-ना तो, एक दौर है.
तू त्याग कर….
यह है प्रलय, तू देख ले.
तेरे सिवा, अब कौन है !
इस देश की, तू सोच ले.
तो ये जहॉं, बेखौफ है.
तू त्याग कर….
तो कर शपथ, ना तोड़ेगा.
हर हुक्म तू, इस देश का.
ये आपदा, कुछ और पल.
जाएगी भी, फिर लौट कर.
तू त्याग कर….
तू देखेगा, एक कल नया.
इस धरती पर, एक युग नया.
जब थामेगा, तू सृष्टि को,
तब पायेगा, दामन नया.
तू त्याग कर….
सुंदर रचना वेदांत…. बहुत सटीक और लयबद्धता के साथ लिखी इस रचना के लिए तुम्हारा हार्दिक अभिनंदन…
Superb and apt poem written by vedant describing the lock_down and yes as he has mentioned is good to be optimistic n March ahead…. With positivity keep writing vedant….